Showing posts with label Granth. Show all posts
Showing posts with label Granth. Show all posts

द्रोपदी के अलावा और भी थी पांडवों की पत्नियां, जानिए पांडवों की पत्नियों और पुत्रों के बारे में

0

ये तो सभी जानते हैं कि द्रौपदी पांचों पांडव की पत्नी थी। मगर ये कम ही लोगों को पता है कि द्रौपदी के पुत्र और पांडवों के अन्य पुत्र व पत्नियों के नाम क्या थे। आइए सबसे पहले जानते हैं द्रोपदी से पैदा हुए पांचों पांडवों के पुत्रों के नाम और पांडवों की अन्य पत्नियों और पुत्रों के बारे में ….

पांडवों की पहली पत्नी – द्रौपदी 
द्रौपदी ने पांच पांडवों से विवाह किया था। उन्होंने एक-एक वर्ष के अंतराल से पांचों पांडव के एक-एक पुत्र को जन्म दिया था। द्रौपदी से जन्मे युधिष्ठिर के पुत्र का नाम प्रतिविन्ध्य था। भीमसेन से हुए पुत्र का नाम सुतसोम था। अर्जुन के पुत्र का नाम श्रुतकर्मा था। नकुल के पुत्र का नाम शतानीक था और सहदेव के पुत्र का नाम श्रुतसेन था।
पांच पांडवों की अन्य पत्नियां
1. युधिष्ठिर – युधिष्ठिर की दूसरी पत्नी देविका थी। देविका से धौधेय नाम का पुत्र था।
2. अर्जुन– द्रौपदी के अलावा अर्जुन की सुभद्रा, उलूपी और चित्रांगदा नामक तीन और पत्नियां थीं। सुभद्रा से अभिमन्यु, उलूपी से इरावत, चित्रांगदा से वभ्रुवाहन नामक पुत्रों का जन्म हुआ।
3. भीम-द्रौपदी के अलावा भीम की हिडिम्‍बा और बलंधरा नामक दो और पत्नियां थीं। हिडिम्‍बा से घटोत्कच और बलंधरा से सर्वंग का जन्म हुआ।
4. नकुल -द्रौपदी के अलावा नकुल की करेणुमती नामक पत्नी थीं। करेणुमती से निरमित्र नामक पुत्र का जन्म हुआ।
5. सहदेव – सहदेव की दूसरी पत्नी का नाम विजया था जिससे इनका सुहोत्र नाम का पुत्र हुअा।

पुराणों में वर्णित शनि देव से जुड़े अदभुत रहस्य


स्कन्द पुराण में काशी खण्ड में वृतांत आता है, कि छाया सुत श्री शनिदेव ने अपने पिता भगवान सूर्य देव से प्रश्न किया कि हे पिता! मै ऐसा पद प्राप्त करना चाहता हूँ, जिसे आज तक किसी ने प्राप्त नही किया, हे पिता ! आपके मंडल से मेरा मंडल सात गुना बडा हो, मुझे आपसे अधिक सात गुना शक्ति प्राप्त हो, मेरे वेग का कोई सामना नही कर पाये, चाहे वह देव, असुर, दानव, या सिद्ध साधक ही क्यों न हो। आपके लोक से मेरा लोक सात गुना ऊंचा रहे। दूसरा वरदान मैं यह प्राप्त करना चाहता हूँ, कि मुझे मेरे आराध्य देव भगवान श्रीकृष्ण के प्रत्यक्ष दर्शन हों, तथा मै भक्ति ज्ञान और विज्ञान से पूर्ण हो सकुँ शनिदेव की यह बात सुन कर भगवान सूर्य प्रसन्न तथा गदगद हुए, और कह, बेटा ! मै भी यही चाहता हूँ, के तू मेरे से सात गुना अधिक शक्ति वाला हो। मै भी तेरे प्रभाव को सहन नही कर सकूं, इसके लिये तुझे तप करना होगा, तप करने के लिये तू काशी चला जा, वहां जाकर भगवान शंकर का घनघोर तप कर, और शिवलिंग की स्थापना कर, तथा भगवान शंकर से मनवांछित फ़लों की प्राप्ति कर ले। शनि देव ने पिता की आज्ञानुसार वैसा ही किया, और तप करने के बाद भगवान शंकर के वर्तमान में भी स्थित शिवलिंग की स्थापना की, जो आज भी काशी-विश्वनाथ के नाम से जाना जाता है, और कर्म के कारक शनि ने अपने मनोवांछित फ़लों की प्राप्ति भगवान शंकर से की, और ग्रहों में सर्वोपरि पद प्राप्त किया।



मोक्ष देने वाला एक मात्र गृह है शनि
शनि ग्रह के प्रति अनेक आखयान पुराणों में प्राप्त होते हैं। शनि को सूर्य पुत्र माना जाता है। लेकिन साथ ही पितृ शत्रु भी। शनि ग्रह के सम्बन्ध मे अनेक भ्रान्तियां और इस लिये उसे मारक, अशुभ और दुख कारक माना जाता है। पाश्चात्य ज्योतिषी भी उसे दुख देने वाला मानते हैं। लेकिन शनि उतना अशुभ और मारक नही है, जितना उसे माना जाता है। इसलिये वह शत्रु नही मित्र है। मोक्ष को देने वाला एक मात्र शनि ग्रह ही है। सत्य तो यह ही है कि शनि प्रकृति में संतुलन पैदा करता है, और हर प्राणी के साथ न्याय करता है। जो लोग अनुचित विषमता और अस्वाभाविक समता को आश्रय देते हैं, शनि केवल उन्ही को प्रताडित करता है।

वैदूर्य कांति रमल:, प्रजानां वाणातसी कुसुम वर्ण विभश्च शरत:।
अन्यापि वर्ण भुव गच्छति तत्सवर्णाभि सूर्यात्मज: अव्यतीति मुनि प्रवाद:॥

भावार्थ:-शनि ग्रह वैदूर्यरत्न अथवा बाणफ़ूल या अलसी के फ़ूल जैसे निर्मल रंग से जब प्रकाशित होता है, तो उस समय प्रजा के लिये शुभ फ़ल देता है यह अन्य वर्णों को प्रकाश देता है, तो उच्च वर्णों को समाप्त करता है, ऐसा ऋषि महात्मा कहते हैं।


इस कारण शनि है पितृ शत्रु
धर्मग्रंथो के अनुसार सूर्य की द्वितीय पत्नी के गर्भ से शनि देव का जन्म हुआ, जब शनि देव छाया के गर्भ में थे तब छाया भगवन शंकर की भक्ति में इतनी ध्यान मग्न थी की उसने अपने खाने पिने तक सुध नहीं थी जिसका प्रभाव उसके पुत्र पर पड़ा और उसका वर्ण श्याम हो गया ! शनि के श्यामवर्ण को देखकर सूर्य ने अपनी पत्नी छाया पर आरोप लगाया की शनि मेरा पुत्र नहीं हैं ! तभी से शनि अपने पिता से शत्रु भाव रखता हैं ! शनि देव ने अपनी साधना तपस्या द्वारा शिवजी को प्रसन्न कर अपने पिता सूर्य की भाँति शक्ति प्राप्त की और शिवजी ने शनि देव को वरदान मांगने को कहा, तब शनि देव ने प्रार्थना की कि युगों युगों में मेरी माता छाया की पराजय होती रही हैं, मेरे पिता पिता सूर्य द्वारा अनेक बार अपमानित व् प्रताड़ित किया गया हैं ! अतः माता की इक्छा हैं कि मेरा पुत्र अपने पिता से मेरे अपमान का बदला ले और उनसे भी ज्यादा शक्तिशाली बने ! तब भगवान शंकर ने वरदान देते हुए कहा कि नवग्रहों में तुम्हारा सर्वश्रेष्ठ स्थान होगा ! मानव तो क्या देवता भी तुम्हरे नाम से भयभीत रहेंगे !

शनि के सम्बन्ध मे हमे पुराणों में अनेक आख्यान मिलते हैं। माता के छल के कारण पिता ने उसे शाप दिया। पिता अर्थात सूर्य ने कहा,”आप क्रूरतापूर्ण द्रिष्टि देखने वाले मंदगामी ग्रह हो जाये”.


यह भी आख्यान मिलता है कि शनि के प्रकोप से ही अपने राज्य को घोर दुर्भिक्ष से बचाने के लिये राजा दशरथ उनसे मुकाबला करने पहुंचे तो उनका पुरुषार्थ देख कर शनि ने उनसे वरदान मांगने के लिये कहा.राजा दशरथ ने विधिवतस्तुति कर उसे प्रसन्न किया। पद्म पुराण में इस प्रसंग का सविस्तार वर्णन है।

ब्रह्मवैवर्त पुराण में शनि ने जगत जननी पार्वती को बताया है कि मैं सौ जन्मो तक जातक की करनी का फ़ल भुगतान करता हूँ। एक बार जब विष्णुप्रिया लक्ष्मी ने शनि से पूंछा कि तुम क्यों जातकों को धन हानि करते हो, क्यों सभी तुम्हारे प्रभाव से प्रताडित रहते हैं, तो शनि महाराज ने उत्तर दिया,”मातेश्वरी, उसमे मेरा कोई दोष नही है, परमपिता परमात्मा ने मुझे तीनो लोकों का न्यायाधीश नियुक्त किया हुआ है, इसलिये जो भी तीनो लोकों के अंदर अन्याय करता है, उसे दंड देना मेरा काम है”.


एक आख्यान और मिलता है, कि किस प्रकार से ऋषि अगस्त ने जब शनि देव से प्रार्थना की थी, तो उन्होने राक्षसों से उनको मुक्ति दिलवाई थी। जिस किसी ने भी अन्याय किया, उनको ही उन्होने दंड दिया, चाहे वह भगवान शिव की अर्धांगिनी सती रही हों, जिन्होने सीता का रूप रखने के बाद बाबा भोले नाथ से झूठ बोलकर अपनी सफ़ाई दी और परिणाम में उनको अपने ही पिता की यज्ञ में हवन कुंड मे जल कर मरने के लिये शनि देव ने विवश कर दिया, अथवा राजा हरिश्चन्द्र रहे हों, जिनके दान देने के अभिमान के कारण सप्तनीक बाजार मे बिकना पडा और,शमशान की रखवाली तक करनी पडी, या राजा नल और दमयन्ती को ही ले लीजिये, जिनके तुच्छ पापों की सजा के लिये उन्हे दर दर का होकर भटकना पडा, और भूनी हुई मछलियां तक पानी मै तैर कर भाग गईं, फ़िर साधारण मनुष्य के द्वारा जो भी मनसा, वाचा, कर्मणा, पाप कर दिया जाता है वह चाहे जाने मे किया जाय या अन्जाने में, उसे भुगतना तो पडेगा ही.

मत्स्य पुराण में महात्मा शनि देव का शरीर इन्द्र कांति की नीलमणि जैसी है, वे गिद्ध पर सवार है, हाथ मे धनुष बाण है एक हाथ से वर मुद्रा भी है, शनि देव का विकराल रूपभयावना भी है। शनि पापियों के लिये हमेशा ही संहारक हैं। पश्चिम के साहित्य मे भी अनेक आख्यान मिलते हैं, शनि देवके अनेक मन्दिर हैं, भारत में भी शनि देव के अनेक मन्दिर हैं, जैसे शिंगणापुर, वृंदावन के कोकिला वन, ग्वालियर के शनिश्चराजी, दिल्ली तथा अनेक शहरों मे महाराज शनि के मन्दिर हैं।

गीता में लिखी है कलियुग से जुड़ी ये बातें, आज हो रहीं सच



श्रीमद्भागवत पुराण हिंदू धर्म के सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथों में से एक है। इस ग्रंथ की रचना आज से लगभग 5000 साल पहले कर दी गई थी। आपको ये जानकर आश्चर्य होगा कि कलयुग में क्या-क्या घटित होगा इसकी भविष्यवाणी भागवत पुराण में पहले कर दी गई थी। जानिए श्रीमद्भागवत पुराण में की गई कलियुग से जुड़ी कुछ भविष्यवाणियां..

श्लोक 1-
ततश्चानुदिनं धर्मः सत्यं शौचं क्षमा दया ।
कालेन बलिना राजन् नङ्‌क्ष्यत्यायुर्बलं स्मृतिः ॥

अर्थ- धर्म, सत्यवादिता, स्वच्छता, सहिष्णुता, दया, जीवन की अवधि, शारीरिक शक्ति और स्मृति सभी दिन-ब-दिन घटती जाएगी।

श्लोक 2-
वित्तमेव कलौ नॄणां जन्माचारगुणोदयः ।
धर्मन्याय व्यवस्थायां कारणं बलमेव हि ॥

अर्थ- कलयुग में जिस व्यक्ति के पास जितना धन होगा वो उतना गुणी माना जाएगा और कानून, न्याय केवल एक शक्ति के आधार पर लागू किया जाएगा।


श्लोक 3-
दाम्पत्येऽभिरुचिर्हेतुः मायैव व्यावहारिके ।
स्त्रीत्वे पुंस्त्वे च हि रतिः विप्रत्वे सूत्रमेव हि ॥


अर्थ- इस युग में पुरुष-स्त्री बिना विवाह के ही केवल एक-दूसरे में रूचि के अनुसार साथ रहेंगे। व्यापार की सफलता छल पर निर्भर करेगी। कलयुग में ब्राह्मण सिर्फ एक धागा पहनकर ब्राह्मण होने का दावा करेंगे।

श्लोक 4-
लिङ्‌गं एवाश्रमख्यातौ अन्योन्यापत्ति कारणम् ।
अवृत्त्या न्यायदौर्बल्यं पाण्डित्ये चापलं वचः ॥


अर्थ- जो मनुष्य घूस देने या धन खर्च करने में असमर्थ होगा, उसे अदालतों से ठीक-ठाक न्याय न मिल सकेगा। जो व्यक्ति बहुत चालाक और स्वार्थी होगा वो इस युग में बहुत विद्वान माना जाएगा।

श्लोक 5-
क्षुत्तृड्भ्यां व्याधिभिश्चैव संतप्स्यन्ते च चिन्तया ।
त्रिंशद्विंशति वर्षाणि परमायुः कलौ नृणाम्

अर्थ- लोग भूख-प्यास और कई तरह की चिंताओं से दुखी रहेंगे। कई तरह की बीमारियां उन्हें हर समय घेरे रहेगी। कलियुग में मनुष्य की उम्र केवल बीस या तीस वर्ष की होगी।

श्लोक 6-
दूरे वार्ययनं तीर्थं लावण्यं केशधारणम् ।
उदरंभरता स्वार्थः सत्यत्वे धार्ष्ट्यमेव हि ॥

अर्थ- लोग दूर के नदी-तालाबों को तो तीर्थ मानेंगे, लेकिन अपने पास रह रहे माता-पिता की निंदा करेंगे। सिर पर बड़े-बड़े बाल रखना ही सुंदरता मानी जायेगी और केवल पेट भरना ही लोगो का लक्ष्य होगा।

श्लोक 7-
अनावृष्ट्या विनङ्‌क्ष्यन्ति दुर्भिक्षकरपीडिताः
शीतवातातपप्रावृड् हिमैरन्योन्यतः प्रजाः ॥

अर्थ- कभी बारिश न होगी, सूखा पड़ जाएगा। कभी कड़ाके की सर्दी पड़ेगी तो कभी भीषण गर्मी हो जायेगी। कभी आंधी आएगी तो कभी बाढ़ आ जाएगी। इन परिस्तिथियों से लोग परेशान होंगे और नष्ट होते जाएंगे।

श्लोक 8-
अनाढ्यतैव असाधुत्वे साधुत्वे दंभ एव तु ।
स्वीकार एव चोद्वाहे स्नानमेव प्रसाधनम् ॥

इस युग में जिस व्यक्ति के पास धन नहीं होगा वो अधर्मी, अपवित्र और बेकार माना जाएगा। विवाह दो लोगों के बीच बस एक समझौता होगा और लोग बस स्नान करके समझेंगे की वो अंतरात्मा से शुद्ध हो गए हैं।

श्लोक 9-
दाक्ष्यं कुटुंबभरणं यशोऽर्थे धर्मसेवनम् ।
एवं प्रजाभिर्दुष्टाभिः आकीर्णे क्षितिमण्डले ॥

धर्म-कर्म के काम केवल लोगों के सामने अच्छा दिखने और दिखावे के लिए किए जाएगे। पृथ्वी भ्रष्ट लोगों से भर जाएगी और लोग सत्ता हासिल करने के लिए एक दूसरे को मारेंगे।

श्लोक 10-
आच्छिन्नदारद्रविणा यास्यन्ति गिरिकाननम् ।
शाकमूलामिषक्षौद्र फलपुष्पाष्टिभोजनाः ॥

अकाल और अत्याधिक करों के कारण परेशान लोग घर छोड़ सड़कों व पहाड़ों पर रहने को मजबूर हो जाएंगे, साथ ही पत्ते, जड़, मांस, जंगली शहद, फूल और बीज खाने को मजबूर हो जाएंगे।

भीष्म पितामह ने बताई थी ये 9 आदतें, जिनसे हर इंसान को दूर रहना चाहिए



महाभारत युद्ध के बाद जब पांडव जीत गए और युधिष्ठिर राजा बन गए, तब युधिष्ठिर कुरुक्षेत्र में तीरों की शैय्या पर लेटे भीष्म पितामह से राजनीति की शिक्षा लेने पहुंचे। भीष्म ने युधिष्ठिर को जितनी भी बातें बताई वे आज भी हमारे जीवन के लिए बहुत उपयोगी है। जब युधिष्ठिर में भीष्म से पूछा कि मनुष्य को किन बातों या किन आदतों से दूर रहना चाहिए तो भीष्म ने उन्हें 9 आदतों के बारे में बताया, जो इंसान के पतन का कारण बनती हैं। वह कौन सी आदतें है, जिनसे हर किसी को दूर रहना चाहिए, इसे लेकर भी भीष्म ने युधिष्ठिर को पूरा ज्ञान दिया।

ये हैं वह 9 आदतों जिनसे हमेशा दूर रहने की सलाह खुद पितामाह भीष्म ने दी है-

1. जुआ
जुआ मनुष्य की सबसे बुरी आदतों में से एक माना जाता है। जुआ खेलने वाला जब इसका आदी हो जाता है, तब वह जुए के आलावा और किसी चीज के बारे में नहीं सोच पाता। वह लालची का हो जाता है और कई बार वह कर्ज में भी डूब जाता है और अपने साथ परिवार की बर्बादी का कारण भी बनता है। जुए की आदत किसी भी मनुष्य को बरबाद कर सकती है, इससे बचना चाहिए।

2. शिकार
आखेट यानी शिकार करना या जीव हत्या करना। कई लोगों को शिकार करने का शौक होता है। शिकार करने को लंबे समय तक स्टेटस सिंबल माना गया है और जो लोग शिकार नहीं करते है वह भी अनजाने में कई बार निर्दोष जीवों की हत्या कर जाते हैं। जीव हत्या बहुत बड़ा पाप माना जाता है। ऐसा करने से मनुष्य को इसके बुरे परिणाम किसी न किसी रूप में झेलना ही पड़ते हैं, इसलिए मनुष्य को इस काम से दूर रहना चाहिए।

3. दिन में सोना
दिन में सोना आलस की निशानी होती है। आलसी मनुष्य घर के प्रति अपनी जिम्मेदारियां कभी पूरी नहीं कर सकता। दिन में सोने वाला आलसी के साथ-साथ कामचोर भी बनता जाता है। ऐसे मनुष्य को हर काम को टालने की आदत लग जाती है। साथ ही देर तक सोना कई बीमारियों का भी कारण बन सकता हैं। इसलिए, दिन में सोने की आदत से बचना चाहिए।

4. दूसरों की निंदा
निंदा करना मतलब दूसरों के कामों में दोष ढूंढ़ना। दूसरों की बुराई करना कई लोगों की आदत बन चुकी है। हर मनुष्य दूसरे में कोई न कोई दोष ढूंढ़ता ही रहता है। दूसरों की निंदा करने से दूसरों का नहीं बल्कि खुद का ही नुकसान होता है। निंदा से ही मनुष्य की बर्बादी की शुरुआत होती है। ऐसे व्यक्ति अन्य लोगों के सामने किसी को बुरा साबित करने के लिए चोरी, हिंसा जैसे काम करने में भी नहीं कतराते। इस आदत को तुरंत ही छोड़ देना चाहिए।

5. स्त्रियों में आसक्ति
आसक्ति यानी लगाव। जिस मनुष्य को स्त्रियों से आसक्ति होती है, वह हर समय उनके आगे-पीछे घूमता रहता है। ऐसा मनुष्य किसी भी समय स्त्री के साथ बुरा व्यवहार कर जाता है। ऐसे व्यक्ति के मन में बुरी भावनाएं उत्पन्न होती रहती हैं। वह अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए किसी भी हद कर जा सकता है और कई बार तो अपराधी तक बन जाता है। इन सबसे बचने के लिए हर मनुष्य को इस आदत से दूर ही रहना चाहिए।

6. शराब पीना
हर व्यक्ति की कुछ सीमाएं होती हैं। सभी को उन सीमाओं का हमेशा पालन करना चाहिए, लेकिन शराब पीने वाले मनुष्य के लिए कोई सीमा नहीं होती। शराब पीने के बाद उसे अच्छे-बुरे किसी का भी होश नहीं रहता है। ऐसा व्यक्ति अपने परिवार और मित्रों को कष्ट पहुंचाने वाला होता है। शराब पीने वाला व्यक्ति अपने साथ-साथ अपने परिवार और दोस्तों के लिए भी परेशानी का कारण बन सकता है। शराब की आदत से कई बार मनुष्य अपना सब कुछ खो बैठता है, इसलिए इस आदत से हमेशा दूर ही रहना चाहिए।

7. नाचना- गाना
नाचना-गाना खुशी व्यक्त करने का एक तरीका होता है। इसके अलावा यह कई लोगों का शौक भी होता है, लेकिन शौक कब आदत बन जाए, पता नहीं चलता। जिस मनुष्य को नाचने-गाने की आदत लग जाती है, वह हर समय यहीं काम करता रहता है। ऐसे मनुष्य का मन अपने कामों और जिम्मेदारियों से हट कर इसी ओर केन्द्रित हो जाता है। जिसकी वजह से उसे कई परेशानियों का सामना करना पड़ता है। इस आदत को छोड़ देने में ही समझदारी होती है।

8. बाजा-बजाना
वाद्य-यंत्र बजाना कई लोगों शौक होता है। एक हद तक तो यह प्रतिभा सभी को अच्छी लगती है, लेकिन हद पार हो जाने पर यहीं आदत परेशानी का कारण बन जाती है। जिन बच्चों को वाद्य-यंत्र बजाने की आदत होती है, वह अपना पूरे समय इसी काम में निकाल देते हैं। ऐसे बच्चों का ध्यान पढ़ाई-लिखाई से हट कर पूरी तरह से इसी ओर चला जाता है। इसलिए इस आदत से बचना चाहिए।

9. व्यर्थ घूमना
कई लोगों को बिना मतलब के घूमने की आदत होती है। जिसकी वजह से वे हर समय कहीं न कहीं भटकते ही रहते हैं। ऐसे लोग अपनी आदत की वजह से बिना बुलाए भी कई जगहों पर पहुंच जाते हैं, जिसकी वजह से कई बार उन्हें शर्मिंदा भी होना पड़ जाता है। जो मनुष्य व्यर्थ घूमने में अपना समय बरबाद कर देते हैं, वे अपनी जिम्मेदारियां कभी पूरी नहीं कर पाते। इस आदत से दूर रहना चाहिए।